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संपादक की ओर से

नमस्कार, और घुड़सवार के एक नए अंक में स्वागत !


इतिहास के किस उद्दंड खण्ड में हम आ चुके हैं शायद आपको इस बात से पता चलेगा कि इस अंक की अंग्रेज़ी कृतियों में ईरान की घटनाएं भी एक प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। अंग्रेज़ी हिस्से की शुरुआत चीनी कवि शिबिन ली की तीन ख़ूबसूरत कविताओं से होती है, जो एक बार फिर शायद हमें इस संसार की सुंदरता की याद दिलाती हैं ओर विश्व की विभिन्न संस्कृतियों की विशिष्ट एवं परस्पर जुड़ी हुई ख़ासियतों की अनुभूति भी कराती हैं। युद्ध केवल बम से ही नहीं लड़ा जाता - अगर हम हिंदी हिस्से की बात करें, तो स्मृति अमृत की कविता 'गुलाब की चप्पल' भी उन चित्तचोरों की बात करती है जो गुलाबी सपने बेचकर दमन को निरंतर जीवित रखते हैं। यह सब देख, मैंने फ़ैसला लिया कि शाब्दिक अर्थ के बम से ही इस अंक को समाप्त किया जाय - अंग्रेज़ी हिस्से की आखिरी कविता मेरी स्वयं की एक छोटी-सी कृति है, जो मैंने मीनाब शहर की छोटी स्कूल की बच्चियों के वध की ख़बर से बेचैन हो कर लिखी थी। यह पहली बार है कि मैं स्वयं अपनी कविता इस पत्रिका में प्रकाशित कर रहा हूँ - आम तौर पर यह नैतिक रूप से ठीक नहीं लगता है, इसीलिए मैं ऐसा नहीं करता हूँ, पर शिबिन ली ने जो शुरू किया, उसे मुझे एक प्रकार का समापन देना उचित लगा, इसीलिए अपनी कृति भी इसमें आख़िर में जोड़ दी। 


मुझे उम्मीद है कि अंक की हर चुनी रचना आप सभी पाठकों को पसंद आएँगी - घुड़सवार के प्रति अपना प्रेम, आदर, स्नेह एवं समर्थन यूँ ही चलते रहने दीजिये। हिंदी के पाठकों से गुज़ारिश है कि अंग्रेज़ी की कवितायें भी पढ़ें, चाहें किसी अनुवाद के एप्प के ज़रिये ही सही। हम सबके लिए एक-दूसरे से सीखने को और प्रेरणा लेने के लिए बहुत कुछ है - अगर हम बस इतना ही कर लें, तो यूँ ही शायद लोग और देश आपस में लड़ना बंद कर दें, और बदमाशों को सत्ता में लाना छोड़ दें। 


सादर प्रणाम !


अंकुर अग्रवाल

संपादक, घुड़सवार साहित्यिक पत्रिका


२६ अप्रैल २०२६, लिल्लेस्त्र्यम, नॉर्वे

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