
दीप्ति भाटिया
यह चेन्नई निवासी हैं, जहाँ यह अपने पति के फ़ोटोग्राफ़ी स्टार्ट-अप बिज़नेस में डिज़ाइनर के तौर पर उनकी सहायक हैं। कविताएं इनके लिए अपने आप से बात करने का माध्यम है। यह कहीं चयनित हों या न हों , इनके लिए अपनी हर कविता उन भावनाओं की अभिव्यक्ति है जिन्हे आसमान में उड़ान भरने की ख़्वाहिश है।
मैंने Poem लिखी
कहीं बम फट गया, शहर ज़ख़्मी हुआ
बड़ा हल्ला मचा
मैंने Poem लिखी
चली खूनी हवा, काफ़ी दंगा छिड़ा
रंग रंग से भिड़ा
मैंने Poem लिखी
जल रही थी दुकान, राख में था मकान
अधमरा सा इंसान
मैंने Poem लिखी
आग बढ़ती गयी, सर पे चढ़ती गयी
सब निगलती गयी
मैंने Poem लिखी
जो भी होता रहा, मैंने होने दिया
मैंने बस यह किया
मैंने Poem लिखी
जीता है जिए, मरता है मरे
जिसका जो मन करे
मैंने Poem लिखी
लोग हैरान थे, काफ़ी परेशान थे
मुझपे इलज़ाम थे
मैंने Poem लिखी
दिन क़यामत का था, ख़ासी दहशत का था
और मुसीबत का था
मैंने Poem लिखी
भीड़ आगे बढ़ी, मुझको घेरे खड़ी
आँखें नफ़रत भरीं
मैंने Poem लिखी
मुझसे बोले ख़ुदा, करके इनको दफ़ा
मुझको अपनी सुना
मन की मंशा बता
मेरे दिल ने कहा, जब ख़ुदा मिल गया
सो अब कहने को क्या
मैंने Poem लिखी