
ऋत्विक
ऋत्विक बिहार के पटना ज़िले के गाँव जमालपुर बीघा के रहने वाले हैं। उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से भूगोल विषय में स्नातक किया है और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर हैं। ग्रामीण परिवेश, वैयक्तिक अनुभवों और मानवीय संबंधों ने उनकी साहित्यिक सोच पर गहरा प्रभाव डाला है। उनकी कविता लेखन के साथ-साथ वाचन में भी विशेष रुचि है। पत्रकार हैं सो रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाएँ, आत्मचिंतन और जीवन के समकालीन प्रश्न अपनी सच्ची शक्ल में दिखाई देते हैं। वे साहित्य को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज से संवाद और आत्म-अन्वेषण का सशक्त साधन मानते हैं।
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उसके बारे में
वो लड़ने की बाट जोहती रहती है
गयी-पुरानी बात खोजती रहती है
थोड़ी-सी नटखट है, थोड़ी चालू है
बदमाशी की चाल सोचती रहती है
कहने को सीधी है, बड़ी सुशीला है
सर पर बैठे बाल नोंचती रहती है
फिर भी उसका होने पर इतराता हूँ
निंदिया भी उसकी गोदी में पाता हूँ
चंचल मन, पर गंगा जैसी शीतल है
उसकी छाया पड़ने पर तर जाता हूँ
बातों में ममता भी बड़ी दिखाती है
मेरे आँसू केवल उसे दिखाता हूँ
सहलाती है बाल तिलस्मी हाथों से
फिर खाती है कान हज़ारों बातों से
मेरे दिल के खाली-खाली बक्से को
धीरे-धीरे भरती है जज़्बातों से
मेरे मन की दुनिया रौशन करती है
चुपके-चुपके चाँद चुराकर रातों से
कहती है - मेरे चंदा हँसते रहना
कैसी भी हो बात मुझे कहते रहना
तुमपे आयी चोट ख़ुशी से सह लूँगी
भला अकेले सहने से दो का सहना
एक शर्त बस चाहे जो भी आन पड़े
मैं तुम्हारी, तुम भी बस मेरे रहना
अपनी नाज़ुक गुड़िया पर इतराता हूँ
दुनिया को मैं हँस-हँसकर बतलाता हूँ
सागर से थोड़ी गहरी है, बादल से थोड़ी मोटी
हद में पर्वत से ऊँची है, कद में कंधे से छोटी।