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डॉ. कुमार कौशिक रंजन

डॉ. कुमार कौशिक रंजन मैकेनिकल इंजीनियरिंग के प्राध्यापक तथा कवि हैं। वर्तमान में वे तोलानी मैरीटाइम इंस्टिट्यूट, पुणे, में सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। उनकी कविताएँ समय, प्रेम, तकनीक और अस्तित्व जैसे विषयों को दार्शनिक गहराई और सामाजिक व्यंग्य के साथ अन्वेषित करती हैं।


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चोर

“मारो, मारो” का उन्मादी शोर,
भीड़ का जमाव ऐसा,
जैसे गेहूँ पर हो रहा हो
ओलों का प्रकोप।


इस
नाटक को देखकर
मेरा मन ललचाया,
बहती गंगा में हाथ धोने को
अकुलाया।


गाड़ी
रोककर दो-चार को
रास्ते से हटा कर,
जैसे नींबू का रस
दूध को फाड़कर
पानी और पनीर को
अलग कर देता है—
मैं भी आगे बढ़ा।


टपक रहा था खून
कभी गालों से, कभी नाक से,
सूजी आँखों में आँसुओं का बोझ
और चेहरे पर
लाल रंग की मोहर।


क्या यह
लाचारी का रंग था
या किसी उदासी का,
या बस एक प्रतिबिंब
उस ज्वार का
जो सामने उमड़ रहा था—
भीड़ के घने उन्माद का?


हाथ जो उठाया था
गिरा न सका,
उस घायल तन-मन को
और चोट पहुँचा न सका,
तुरंत न्याय कर न सका।


गया था किसी वीर की तरह,
लौट आया
लिए एक रक्त का छींटा
अपने मन पर—
जैसे मैं हूँ एक चोर।

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