
महेश शर्मा
यह लखनऊ, उत्तरप्रदेश, भारत, के निवासी होकर बैंक सेवा से रिटायर्ड अधिकारी हैं | कहानी, कविता, गीत, ग़ज़ल और लघुकथा में समान अधिकार से लेखन करते हैं | इनका देश की अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं मे रचना प्रकाशन रहता है | म. प्र. शासन एवं विभिन्न संस्थाओं-समूहों से सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हुए हैं | कहानी 'गरम रोटी' पर दिल्ली में नाट्य मंचन हो चूका है | यह दो कहानी संग्रह, एक गीत संग्रह और दो उपन्यासों को प्रकाशित कर चुके हैं | एक लघुकथा संग्रह , एक ग़ज़ल संग्रह और एक उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य होने हैं | लघुकथा लेखन पर शब्दनिष्ठा पुरस्कार प्राप्त हो चूका है।
मेरा ईश्वर
ईश्वर सबके होते हैं |
अच्छे के भी, बुरे के भी
खरे के भी, खोटे के भी
छोटे और बड़े के भी
इस धर्म के भी, उस धर्म के भी
और विधर्मी के भी |
जो मानता है, उसके भी
और जो नहीं मानता, उसके भी ।
बस
सबका रुप-रंग, और रहने का स्थान
अलग-अलग है ।
किसी का ईश्वर भव्य मन्दिरों में
किसी का आग में , पानी मेंा है, तो
किसी का होमो-हवन में, ध्यान और भजन में |
किसी का आग में,पानी में
जंगलों-पहाडों में, नदी और तालाबों में,
किसी का तोप-तलवारों में
बम और बन्दुकों में भी |
कुछ का ईश्वर पुर्व में
कुछ का पश्चिम में ।
और बहुत सारों का दूर आकाशों में |
लेकिन मेरा ईश्वर तो इनमें से कहीं नहीं रहता ।
वह किसी एक जगह
बंधकर भी नहीं रहता । वह तो,
यत्र, तत्र, सर्वत्र है
कली में, फुल में
आंगन की धुल में
हंसने में, रोने में
जागने में, सोने में
हर बच्चे में, हर बुढे में
आदमी में भी, औरत में भी छुपा है
बल्कि वह मुझ में भी समाया है
यानी हर जीव में वह नुमाया है ।
इसीलिये मैं हमेशा
चौकन्ना रहने की कोशीश करता हूँ
इस सर्वव्यापी ईश्वर के हर रुप के प्रति |
श्रद्धा और विश्वास, सेवा और सम्मान
और कुछ त्याग की भावना
कभी कम ना हो
उसकी अवमानना और अपमान कभी ना हो
उसका हर प्रतिक, उसकी हर रचना
मुझ पर प्रसन्न रहे ।
बस यही मेरी ईश्वर पुजा है ।