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नज़ीर

यह एक चिकित्सक हैं जो इस दुनिया के दर्द को बहुत गहरी समानुभूति के साथ देखते हैं और अक्सर दुनिया के पाखंड और दोहरे मापदंडों से परेशान होते हैं। यह दुनिया को दया, करुणा और प्रेम की नज़र से देखना चुनता हैं। 

समाज की नाक

इंसान की नाक बड़ी अजीब चीज़ होती है

सांस या सुगंध लेने के लिए नहीं

समाज में जीने के लिए

किसने रखी होगी अपनी इज़्ज़त सबसे पहले अपनी नाक पर ?

क्या इसलिये लक्ष्मण ने सुरपंखा की नाक काटी थी?

कि वो समाज के हिसाब वाली नाक नहीं थी ?

कब से काटी जा रही है औरतों की नाक?

या फिर इसीलिए उन्हें नक-कटा का नाम दे दिया जाता है ?

क्या कोई लक्ष्मण की नाक काटने जाएगा जब सीता वन को विदा हुईं ?

राम सरयू में हुए और हनुमान,‌ विभीषण दर्शक हुए

लेकिन अब तो सब नक्कटे हो चुके है

समाज की नाक भी तो बहुत छोटी है ना

हर बात पर वो कट जाती है

कहां जाएगा ये नाक काटने का समाज?

क्या वो सुरपंखा की पूजा करेंगे ?

या लक्ष्मण का सामुहिक दहन‌ ?

ये नाक जो अपने शरीर से निकली है

क्या ये अपनी नहीं होनी चाहिए?

क्यूं दान दे दिया जाये उस समाज को ?

जिसकी अपनी कोई नाक नहीं

नाक हमेंशा अपनी ही होनी चाहिए इस दुनिया में

सूंघने के लिए, सांस लेने के लिए और जीने के लिए

क्योंकि वो बताती है सड़ांध और नवीनता की पहचान

और ख़ुद इस नाक को नीची करना अपनी आँखो में ख़ुद को नीचा करना है

और इसलिए हम नक्कटे बनते हैं

क्योंकी नाक तो‌ सिर्फ एक नारा है

आज़ादी और उद्दंडता को नाक‌ तक बांधने का ।

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