
ज़ालिम
इनका नाम राहुल सिंह है, और यह ज़ालिम के नाम से लिखते हैं। यह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले के निवासी हैं। प्रारंभिक शिक्षा, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा गोरखपुर में ही प्राप्त की है, और उच्चतर शिक्षा जोकी मनोविज्ञान (हॉनर्स) की पढ़ाई यह इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कर रहे हैं । यह मनोविज्ञान के द्वितीय वर्ष के छात्र हैं। इन्होंने एस्ट्रोफिजिक्स में भी एक शोधपत्र प्रकाशित किया है। इन्होंने तक़रीबन २०० कविताएँ लिखी हैं जो ग़ज़ल नज़्म की विधा में हिंदुस्तानी भाषा में हैं । इन्होंने तक़रीबन ५० कविताएँ हिंदी में लिखीं हैं जो अभी तक कहीं भी प्रकाशित नहीं करायी हैं ।
बेख़ुदाई
आओ कागज़ी पहरेदारों अपना रूह शेंक लो।
मैं इस शहर से अपना घर जला के जा रहा हूँ।।
जिनकी हिफ़ाज़त की तुमने क़शम खायी थी।
उन सारे बुतों को मैं यहीं दफ़ना के जा रहा हूँ।।
जिन बुनियादी पत्थरों पे टिका था मकान मेरा।
सारी बुजुर्ग चट्टानों को पिघला के जा रहा हूँ।।
ना गुज़रूँगा तुम्हारे इस शहर से आईंदा कभी मैं।
अपने सारे इरादों को अपाहिज बना के जा रहा हूँ।।
जब उड़ेगी राख तो हर इमारत काली दिखेगी।
मैं इस सफ़ेद शहर को काला बना के जा रहा हूँ।।
उगेंगी नश्लें तो तुमसे इसकी वजहें ज़रूर पूछेंगीं।
मैं कुछ नुकीले सवाल जमीं में दबा के जा रहा हूँ।।
जब कोई पूछे सच के बारे में तो ख़ामोशी बरत लेना।
“ज़ालिम”अब मैं सारे इल्ज़ाम ख़ुद पे लेके जा रहा हूँ।।