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अजय सिंह शीला

वह सीकर, राजस्थान, के रहने वाले हैं, पर फ़िलहाल मुंबई की भागदौड़ में पटकथा लिखते हुए ख़ुद को तलाश रहे हैं। कविता और साहित्य से उनका पुराना जुड़ाव रहा है, लेकिन यह उनकी पहली कविता है। घुड़सवार में उनकी रचना का चयन होना उनके लिए गर्व और सम्मान की बात है।


इंस्टाग्राम - @ajaysheela

“ऐसे ही”

मेरे 19 साल के गाल पे प्यो दा छाप्पड़ पड़ने ही वाला था,

कि मम्मी आई, बोलीं ‘कैसे हाथ लगा दोगे ऐसे ही?’

'ये सितारा नकारा है तुम्हारा,

देख लेना, गाँव में डोलता फिरेगा ऐसे ही।’


शादी करा दो!

70 साल के लफ़्ज़ बोले,

'दिल लग जाता है इस उमर में,

चलते-फिरते ऐसे ही'।


फिर क्या था, डेढ़ सौ रिश्तों के झोले वाला बिचोला,

सात जन्मों वाला रिश्ता झोले से निकाला,

45 के एंगल से देखा और बोला,

‘बेटा, कमाते-वमाते हो या... ऐसे ही’

‘बड़े लोग हैं, सौ बीघा खेत है,

साल में 10 बोरी तो दान में दे देते हैं ये ऐसे ही।’


एंगल घूमा बुआ पे,

'ना रील, ना इंस्टा, ना ही मेटा,

21 लाख और एक क्रेटा,'

बुआ से पहले तो 'वाह' निकला फिर बोली,

‘हमें तो यही लड़की चाहिए, ऐसे के ऐसे ही।’


अरे, कोई मेरी भी तो सुनो यार,

सपने हैं मेरे भी,

फूफा जी कट्स मी,

‘अरे, मैं बैठा हूँ न यार,

ये बाल थोड़ी सफ़ेद हुए हैं ऐसे ही।’


अगले शनिवार हुआ पहला वार,

आपको जल्दी लग रहा होगा,

पर हमारे यहाँ शादियाँ होती हैं ऐसे ही।


रूबरू हुए, होने वाली के यहाँ,

एक समोसा, दो बर्फ़ी, थोड़ी नमकीन,

मैंने तो हाथ ही नहीं लगाया,

मेरे भले से पड़ी रहे, ऐसे के ऐसे ही।


पाँच मिनट बाद दीदार हुआ,

उसके बैठने से पहले ही पूछ लिया,

‘बहू कैसी लगी?’

'अरे यार मम्मी, घूँघट में कैसे बता दूँ ऐसे ही'

'अरे तो साइड में जाके बात कर लो,

हमें क्यूँ कबाब में हड्डी बना रहे हो ख़ामख़ा ऐसे ही।’


बगीचा, हजारे की ख़ुशबू,

दो कुर्सी, एक चाय और एक ‘फ़िफ़्टी परसेंट इनविज़िबल फेस…

पर जैसे ही घूँघट उठा, दीदार हुआ, आँखें मिलीं,

क्या बताऊँ, क्या ही चेहरा था,

फूफा जी सही बोल रहे थे,

मैं ही फ़ालतू में डर रहा था ऐसे ही।


ए.आई. चैटबॉट से पूछा था बाद में,

उसने बताया,

भाई साहब ऐसी दो ही हैं,

एक आपके पास है, और एक अभिषेक बच्चन के पास है ऐसी ही।


‘तारीफ़ भी करोगे या बस घूरते ही रहोगे ऐसे ही?’

‘गा के बताऊँ?’

"हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो, जैसा मैंने सोचा था!"

‘अरे! तुम तो गाना भी गा लेते हो?’

‘हॉबीज़ में लिखा तो था... कभी-कभी गा लेता हूँ, ऐसे ही।’


कट टू, अब दो बच्चे, एक धुँधला सपना और ‘वो’ क्रेटा,

लेके डोलते फिरते हैं गाँव में,

कभी-कभी कोई पूछ लेता है, 'कैसे हो?’

शीशे से सर सटा के कहते हैं,

‘सिन्सियरली स्पीकिंग भाई साहब... बस जी रहे हैं… ऐसे ही।’

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