
गरिमा मिश्रा
गरिमा मिश्रा दो दशक तक द इंडियन एक्सप्रेस में पत्रकार रहीं और २०१५ में एक्सप्रेस एक्सीलेंस अवार्ड जीता। पत्रकारिता के बाद उन्होंने सुनंदा पुष्कर की जीवनी पर बतौर सहयोगी कार्य किया और फिर कविता लेखन की ओर मुड़ीं। उनकी कविताएँ उड़ान नए परिंदों की और इको ऑफ द अनहर्ड में प्रकाशित हुई हैं। वे 'मुझ जैसी' कविता परियोजना की लीडर और लफ्ज़ बाय गरिमा पॉडकास्ट की होस्ट हैं। २०२४ में उन्होंने पुणे में कविताKAFE मंच शुरू किया। मार्च २०२५ में उन्हें राष्ट्रीय नारी सशक्तिकरण संघ की तरफ से प्राइड ऑफ़ महाराष्ट्र अवार्ड मिला है | वर्तमान में वे मान देशी फाउंडेशन में लेखक-संपादक हैं।
इंस्टाग्राम - @garimamishra03 & @kavita.kafe
रफ़ू
ईंटा-गारा जोड़-तंगोड़,
मैंने घर की छत बनवायी है |
पहली बौछार भी बीत न पायी,
और छत रिसने को आयी है |
कड़ी मरम्मत, बड़ी मश्शकत,
फिर भी ये रिसने लगती है |
मैं एक सिरे में रफ़ू लगाऊं,
दूजे से झिरने लगती है |
दीवारों से टपकती बूँदें,
गालों से बह जाती हैं |
चलकर आगे होठों तक,
नमकीन सी हो जाती हैं |
अब न है सावन, न ही भादों,
ये छत आज भी गीली है |
कड़क धूप खिड़की से दिखती,
मेरे घर की फर्श क्यूँ सीली है...
मेरे घर की फर्श क्यूँ सीली है।