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गिरिजा

गिरिजा कहती हैं - "मैं लिखती हूँ ताकि जीवन की छोटी-छोटी बातों, भावनाओं और एहसासों को शब्दों में रख सकूँ। यह हिंदी कविता मेरे मन का एक छोटा प्रयास है। ख़ुशी है कि इसे यहाँ जगह मिली। आगे भी ऐसे ही लिखती रहना चाहती हूँ।"

आकांक्षित

वह जो ढूंढते हो आसमानों में तुम,

जमीन पर क्यों न मिला?

कोशिश की भी या नहीं तुमने?

या हर बार लड़खड़ा कर गिरा?


देखकर चंचल नैन तेरे,

मयंक भी आज व्याकुल है।

निहार ज़रा गौर से,

ये चंद्रिका भी साक्षी है।


बावरी ये आशाएँ तेरी,

शिखर उड़ान चाहे रे।

फिर भी, ये मोह की बेड़ियाँ,

जग का सहम लिए—

क्यों रोके तेरा ख़्वाब रे?


कुछ इस तरह फंस गए मिट्टी में पाँव तेरे,

बाहें खोलने पर भी आज़ादी न दे रही हाथ तुझे।

जकड़ ले पवन को तू, बांध ले एक डोर,

ज़मीन से थोड़ी दूर, आसमान के करीब,

जा, अपनी एक मंज़िल खोज।


देख, खयालों से ही चमक उठे ये तारे,

पूछें – "अब कैसी निराशा है?"

गुमसुम जो बैठे हो, नदिया बहाए,

देख, ध्रुव सभी के संग अकेला है। 

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