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कुमार कौशिक रंजन

डॉ. कुमार कौशिक रंजन यांत्रिक इंजीनियरिंग के एक शिक्षाविद और हिंदी-अंग्रेज़ी द्विभाषी कवि हैं, जिनकी रचनाएँ तकनीकी विवेक और काव्यात्मक संवेदना के संगम पर खड़ी होती हैं। पश्चिम बंगाल के कोलकाता में जन्मे, उन्होंने एक दशक से अधिक समय तक शिक्षक के रूप में सेवा दी है। उनकी हिंदी कविताएँ समय, प्रेम, धर्म और अस्तित्व के विरोधाभासों से जूझती हैं—उनकी शैली दार्शनिक गहनता और छंद की प्रयोगशीलता का अनूठा मिश्रण है—जहाँ पौराणिक प्रतीक नए अर्थ ग्रहण करते हैं, और आधुनिक जीवन की जटिलताएँ काव्यबद्ध होती हैं। शिक्षण और लेखन के अतिरिक्त, वे प्रौद्योगिकी और मानवीय संवेदनाओं के बीच के अंतर्संबंधों को खोजते रहते हैं।


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चाटुकार

धन है मेरे पास

मैं हूँ बड़ा साहूकार।

मेरे ऋणी हैं मेरे आस-पास,

सबकी जी-हुज़ूरी मदमस्त हो सुनता हूँ।

बीच-बीच में उन्हें एक हल्की चपत-सी देता हूँ,

कहता हूँ—"तुम सब हो बड़े चाटुकार।"


बैठा हूँ एक ऊँची कुर्सी के विपरीत ओर,

सुन रहा हूँ आवर्ती प्रलाप का शंखघोष,

मानो हो रहा हो आत्मज्ञान का विजय घोष।

सुन कर हाँ में हाँ भी करता जाता हूँ,

अपनी ऊंघ को छुपाता जाता हूँ।




साहब ने जैसे मेरी ऊब को भांप लिया,

और उलाहने के स्वर में मानों कटाक्ष किया —

"तुम तो मेरे अपने हो साहूकार,

क्या तुम भी बन गए हो चाटुकार?" 

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