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स्तुति श्रीवास्तव

स्तुति श्रीवास्तव ख़ुद  को लेखक बोलने के पहले धरती में समा जाती हैं। वह असमानता एवं आंतरिक विचारों के बारे में लिखना और किताब ले कर कोने में खो जाना पसंद करती हैं।


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कुछ सवाल, कुछ जवाब

सुबह, तुम कब शाम होती हो?

धूप, तुम कब छांव?

बादल के आँसू कब हैं खुशी के, कब ग़म के?

समुंदर क्या है वाकई नील, या मेरा मन गंभीर? 


कल बारिश में मन के जंजाल भीगने और भिगोने के बाद

मैं घास पर लेट कर जैसे चित्त पट सी हो गई थी

अचानक मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू ने मुझे लपेट लिया और कहा

डूबती जाओगी तो उभरोगी कैसे और उभराओगी कैसे?


हवा, तुम बहने के बाद सोती हो क्या?

रात, तुम चुपके से अपने रंग में रोशनी घोलती हो क्या?

क्या मैं दलदल में फिसलती लय को जला सकती हूँ?

क्या आंखों को पलकों का सौम्य सहारा छोड़ खोल-बंद कर सकती हूँ?


आज धरती नहीं फटी, पर मैं ख़ुद में फूल कर समा कर उड़ रही हूँ

अपने सवालों के बेख़ौफ़ दायरे सोच कर डर भी रही हूँ

लेकिन भूलिए मत, मैं डंके की चोट पर इतरा और इठला तक रही हूँ

क्योंकि आज सवाल मेरे हैं, और जवाब भी मेरे हैं। 

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