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आभा शर्मा

घमासान है विद्यमान

घमासान घमासान घमासान, सर्वत्र ही है विद्यमान

विचारों से विचारों का, आचारों से आचारों का

स्वयं से स्वयं का, स्वयं से त्वयं का

घर में पीढ़ियों का, संग सफलता की सीढ़ियों का

सफलता की अन्धी दौड़ में, शीर्ष पर है आने का

हर पग हर रग, हर पल हर मन,

हर क्षण हर थान, घमासान है विद्यमान ॥


पहले घमासान युद्ध में होता था, लेकिन अब

प्रात: से रात तक, जन्म से निजात तक

मात की कोख से, श्मशान की राख तक

भूमि से आकाश तक, जग के हर एक प्रांत तक

खेल के मैदान से, राजनीति की दुकान तक

झेलता रहता जिसे, हर कोई अन्तिम श्वास तक

सर्वत्र विचरण कर रहा, घमासान है विद्यमान ॥


जन्म से पूर्व प्रदूषित जगत में, स्वस्थ आने का

जन्म पश्चात् ३-४ का होते ही, प्रतिष्ठित विद्यालय में प्रवेश पाने का

हर क्षेत्र में स्वयं को, सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर पाने का

पढ़-लिख, परीक्षा, साक्षात्कार से गुज़र, इक अदद नौकरी जुटाने का

नौकरी, विवाह, बाल-बच्चे, उनका पालन पोषण

घर को शान्ति से चलाना, काम नहीं है आसान

स्वयं की श्रेष्ठता का, समाज में सर्वोच्चता का

इससे सब त्रासित हैं, घमासान है विद्यमान ॥


प्रतिदिन की दिनचर्या भी, स्वयं में है घमासान

सुबह की चाय, कौन बनाएगा

लंच बना दिया, ज़रा पैक है करना

बच्चों को स्कूल भेजकर, दफ्तर है पहुँचना

वरिष्ठ की सुनना, अधीनस्थ को है झेलना

जीवन की हर डगर पे, इस जंग से है खेलना

बच्चा-बड़ा, स्त्री-पुरुष, ग़रीब-अमीर, मालिक-मज़दूर

सब दो हाथ करते रहते, घमासान है विद्यमान ॥


ग़रीब का जीना तो, हर पल ही घमासान

सुबह के निवाले से, भर-पेट नींद रात में मिलना

दो हाथ की कमाई से, दस पेट का है भरना

बच्चों को पढ़ाना, या काम पर है लगाना

गाँव की टपकती छत को, है ठीक कराना

बिटिया के विवाह में, दहेज-दानव मुँह निगले;

गाँव-देहात भर का पेट भी है सहलाना

ग्रामीण-बैंक, साहूकार का कर्ज भी, इनको ही चुकाना

ग़रीब ही जन्म ले, निधन निर्धन ही हो जाना ॥


अमीर का घमासान, कुछ अलग होता है

उसकी गाड़ी मेरी गाड़ी से, बड़ी कैसे है

उसका शरीर गहनों से लदा, शिविर कैसे है

संग साथ वालों से मुझे, शीर्ष पर रहना है

क्लब-पार्टी में भी अपनी, शान दिखानी है

घर-कपड़ो, गहनों का नवीनीकरण, आए दिन कराना है

ऐशो-आराम कम नहीं, बस रोग ज़्यादा है

सुख चैन थोड़ा कम, पर तनाव ज़्यादा है ॥


हथियारों की होड़ में, विश्व गुरु बनने का घमासान

पर क्या सोचा—

हिंसा का जखीरा बना, इंसानियत का कफ़न

मरने पे नहीं जीवन में ही, नरक दिखलाया

मनुष्य न आज मानव रहा, बना दैत्य घमासान से

स्वाहा हैं सुख-चैन सब, इसकी जठर आग से

न जाने कब तक यूँ ही यह, इस जग को रुलाएगा

क्या मनुष्य कभी स्वयं को, इससे मुक्त कराएगा ॥


तो आओ कुछ बदलाव की हवा चलाएँ

घमासान रूपी दानव को अब स्वाहा कराएँ

कुछ स्वयं की, कुछ अपनों की

ज़िन्दगी ख़ुशनुमा बनाएँ

वसुधैव कुटुम्बकम् को फिर अपनाएँ

इंसानियत की बयार क्यों न बहाएँ

सर्वत्र व्याप्त घमासान का अन्त कराएँ

प्रेम संग कदम बढ़ा, इक नया जहाँ बसाएँ ॥

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