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देव

देवांश दीक्षित 'देव' सन् २००६ में उत्तर प्रदेश, भारत, के एक छोटे से कस्बे, बांगरमऊ, में पैदा हुए और वहीं पले-बढ़े। फ़िलहाल वह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में स्नातक के छात्र हैं। कविताएँ लिखना १६ वर्ष की उम्र में यूँ ही शुरू किया और देखते ही देखते इस कला से ऐसा प्रेम हुआ कि अब इनके जीवन में माता-पिता के बाद लेखन का ही स्थान आता है।


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ओस की बूँदें

एक छोटे से गाँव का

एक छोटा मैदान,

उस छोटे मैदान की

ढेर सारी घास,

ढेर सारी घास यानी

ढेर सारी पत्तियाँ,

ढेर सारी पत्तियों पर बैठीं,

ढेर सारी ओस की बूँदें।

छोटी-बड़ी, चमकती बूँदें।

बड़ी बूँदें छलक जातीं हर पल।

हर पल मिट्टी और महकती।

छोटी बूँदें बैठी रहतीं,

बन जातीं आईना।

छोटे से आईने में दिखता

ढेर सारा अंबर।

ढेर सारे अंबर में,

ढेर सारे, हट्टे-कट्टे बादल।

तैरते बादल।

सुंदर बादल।

छोटी ओस की बूँदें,

हर रोज़ तकतीं बादल।

बड़ी बूँदें,

हर रोज़ छलक जातीं।


एक छोटे से गाँव का

एक छोटा मैदान,

उस छोटे मैदान के पास

एक छोटा तालाब,

उस छोटे तालाब में

ढेर सारा पानी,

ढेर सारा पानी सहता

ढेर सारी धूप,

ढेर सारी धूप यानी

ढेर सारी भाप।

चिलमिलाती भाप।

बिखर जाती भाप।

दिन ढल जाता है,

धूप चली जाती है,

फिर आती है रात।

रात यानी ठंड।

रात यानी दुलार।

रात यानी आराम।

अगर भाप रात का

आराम नहीं लेती है,

दुलार नहीं लेती है,

ठंड नहीं लेती है;

अगर भाप अगले दिन

फिर से चिलमिलाती है,

बिखर जाती है;

कुछ दिनों बाद,

वही भाप बनती है,

बड़े से अंबर का,

एक हट्टा-कट्टा बादल।

तैरता बादल।

सुंदर बादल।

मगर ठंडी रात में,

दुलार वाली रात में,

आराम वाली रात में,

वही भाप अगर

सहम जाती है,

अगले दिन की धूप से,

चिलमिलाहट से,

बिखर जाने से;

वही भाप अगर

बहल जाती है,

ठंड वाली रात से,

दुलार से,

आराम से;

फिर


एक छोटे से गाँव के

एक छोटे मैदान की

ढेर सारी घास की

ढेर सारी पत्तियों पर बैठी रहतीं,

ढेर सारी ओस की बूँदें।

बड़े से अंबर के ढेर सारे,

तैरते, सुंदर, हट्टे-कट्टे,

बादल तकती बूँदें।

उदास बूँदें।

हताश बूँदें।

छलक जातीं बूँदें।

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