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ज्योति प्रकाश

ज्योति प्रकाश कविताओं की दुनियां में एक छोटा सा कोना ढूंढ रहीं हैं। लिखने पढ़ने के अलावा इन्हें दिल्ली में उड़ रहे कबूतरों को निहारने का भी शौक़ है।

उजाड़

माथे पर हड्डियों ने दस्तक दी

आंखें ऐसे बाहर निकल कर आईं

जैसे खौलते पानी से निकलता है हाथ!

एक ही छन में मांस से बुने स्वेटर को उतार

चलने लगी,

कुछ रक्त, कुछ जल, कुछ वायु और कुछ उधड़े जाले

लिए।


ठोकरों से बचने को वाहन भी था,

लंबे-लंबे नाखूनों की सवारी।

आख़िर यम के वाहन से कम थोड़ी थी!

कमी थी तो कोई बोलने-बतियाने वाले की,

तो निकाल दिए मस्तिष्क के एक छोर में

बसे कई धुंधले चेहरे,

और भर दिए रंग टपकते रक्त के लच्छों से।


अब बोलती तस्वीरें क्या बोलेंगी ये सोचना था!

तो तोड़ दी गले की हड्डी,

मारे दर्द के कराहते फुट गए सबके गले से बोल।

पर रुक ही नहीं रही थीं चीखें!


अरे! ऐसा भी क्या हो गया? एक हड्डी ही तो टूटी है!

बोली वो आठ आने में दो गुड़ की भेली देने वाली

बूढ़ी अम्मा!


तुम मलिन हो, तुम्हें क्या पता आवाज़ क्या होती है, अपनी बातें रखना क्या होता है?

कुछ चिड़चिड़े से लहज़े में बोले पुजारी जी!

वहीं जो चढ़ावे की थाली में से लंबा हाथ मारते थे।


संन्यास की उम्र में इन्हें कौन ले आया इस सैर-सपाटे पर, पेड़ से उल्टे लटके लड़को की टोली गुर्राई!


अपनी खाल उधड़वाना चाहते हो तो ही निकालना अगला शब्द अपने भांड जैसे मुंह से,

भौंहे तानते हुए बोले मास्टर जी।

अरे! वहीं जो हर रोज़ पीछे के दरवाज़े से जाते थे बूढ़ी अम्मा के घर उनकी बहू के हितैषी बनने!


आज भी कितना ख़ौफ़ है बच्चों में इनका, बोलीं मास्टर की पत्नी,

जी बिल्कुल सही समझे, पुजारी की बेटी!


हां जैसे तुझे बांध कर रखा किसी गाय-गोरू सा और ख़ुद खुले सांड सा दरवाज़े खटखटाता रहा, वैसे ही सोचता है सब इसकी जी-हुज़ूरी करें,

मुंह को टेढ़ा करते हुए बोलीं फिर से बूढ़ी अम्मा!


और ऐसे ही

एक के बाद एक आवाजें विवाद में बदलती चली गयीं!

इस विवाद से जन्मा प्रतिशोध,

और प्रतिशोध कब शांत हुआ है बिना ख़ून में नहाए!


इन लाशों को देख बह निकला आंखों से भी लहू,

इतना की सूख गया पूरी काया का जल।

खौलने लगा सब कुछ इसकी आग में,

गल कर गिरने लगा जो कुछ था अधीर!

बची हड्डियां अकेले ही बचीं,

काटने को कल्पनाओं की कल्पना में बाकी बचे हुए दिन!

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