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नंदन सिंह
टूटा पत्ता
मैं टूटा पत्ता शाख़ से,
और जा मिला हूँ राख में।
गिरा वहाँ जहाँ पड़े,
दहक रहे अंगार थे।
मैं छू न पाया शोला भी,
लपट कपट फैला रही।
मिला दिया हवा में ही,
जला न था मैं पूरा भी।
अधूरा सा मैं रह गया,
और पूरा ग़म मैं सह गया।
ज़मीं से भी न मिल सका,
हवाओं में ही बह गया।
मैं आँसुओं से गीला था,
ये आसमाँ भी पीला था।
पतंग के रंग भी ढंग थे,
मैं डोर से भी मिला था।
एक दिन तूफाँ भी थम गया,
मैं धूल संग ही जम गया।
मैं मिट्टी से न मिल सका,
मैं पानी में न गल सका।
क़ुदरत भी बड़ी सख़्त है,
बदल रहा ये वक़्त है।
मैं अपना आख़िरी वंश हूँ,
यहीं पे मेरा अंत है...
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