top of page

नेहा कुमारी

नेहा कुमारी को कविताएं लिखने में बहुत आनंद आता है और ये इनका शौक़ भी है । इनकी पसंदीदा कविता रबीन्द्रनाथ टैगोर की 'मुक्ति' है। इन्हे प्रकृति के बीच आध्यात्मिक किताबें पढ़ना और चित्रकला करना पसंद है। अपनी रचनाओं के माध्यम से कुछ ख़ास पल अपने लिए समेटती हैं और इसके साथ-साथ इनका लक्ष्य ये भी रहता है कि इनकी रचना लोगों के जीवन में आनंद ला सके।

बीते दिन

जब देखा ज़माना

जवानी में ...

तो ख़याल आया,

आखिर बड़े होकर ...

मैंने क्या पाया ?


एक कंकड़ का महल

चार लोगो की बातें,

दो पैसे जेब में ...

और वीरानी रातें।


ना काग़ज़ की नाव

ना घोड़े की सवारी,

बस काम की उलझन

और दुनियादारी।


क्यों दौड़ता जा रहा ...

वक़्त का पहर,

ऐ तुफ़ानी उमर

अब ज़रा ठहर।


मैं समेट लूँ ज़रा

वो यादों का पिटारा,

वो चाँद की ठंडक

और टिम-टिम तारा।


माँ की पायल ...

बाबा का रुमाल,

किस्से पुराने

और बीते साल।


कच्चे अनार

खट्टा अचार,

अरहर की दाल ... और

दीदी का दुलार।


हँसता हुआ आँगन ... था

शक्कर की गोली,

फ़सलों का पकना ... था

फागुन की होली।


सूरज की लाली

तुलसी की माला,

फूस के छप्पर ... और

मेरी पाठशाला।


बेलों की छाव ... और

मेलों का नाच,

साइकिल का पहिया

और साथी पांच।


बिस्कुट की थैली

गलियों का शोर,

कंचों का डिब्बा ... और

पतंग की डोर।


जलेबी और रबड़ी ... और

मिट्टी के बर्तन,

आम का झूला ... और

मेरा खोया बचपन।


ध्यान दें - यह कविता हिंदी अख़बार 'अमर उजाला' की वेबसाइट पर सर्वप्रथम प्रकाशित हुई थी। 

bottom of page