
शशांक शेखर
शशांक शेखर वर्तमान में भारत सरकार के अधीन कार्यरत हैं | हिंदी साहित्य से स्नातकोत्तर, बिहार के वैशाली जिले से आते हैं, और अपने खाली समय में हिंदी की कवितायेँ लिखने का प्रयास करते हैं |
‘शैलजा’
समय का यूँ चक्र घुमाया, हम पे यह उपकार किया !
हमारे इस निर्जर जीवन का, उपवन सा सत्कार किया !!
बेटी; मुझे दे के ईश्वर ने, प्राणों में प्राण उकारा है !
हूँ लाख कृतज्ञ उस ईस का, जिससे यह नवजीवन पाया है !!
तनये, मै तुमको क्या बतलाऊं क्यों पिता तुम्हारा हँसता है ? !
यूँ, तेरी तुलिका कला देख निरानंद, आनंदित होता है !!
शत-शर-जर्जर यह देह, तुमको पाकर अपने गेह, यह निराकार हो जाता है !
तुम्हारे कोमल हस्त-पद-नग-शिख देख यह जीवन परमार्थ हो जाता है !!
तुम कमल-पंखुरी सी कोमल, तुम कुमुद सरीखा हो नाजुक !
माता के अंतर का हो प्रकाश, और पिता का हो तुम जीवन स्वास !!
घुटने पर रेंगती जब पापा-पापा कहती है !
सचमुच कहता हूँ, हे ईश्वर, वह मेरे सारे दुःख हर लेती है !!
तुम्हारे यह चपल तूर्ण चरण, मै खड़ा देखता मूलाधार में जाता हूँ !
सहसा, तुम्हें पा अपनी गोद में अनाहत को पाता हूँ,
चुम्बित हो तुमसे तृप्त, अंततः सहस्त्रार में खो जाता हूँ !!
हे बेटी, तुम पिता की शान हो, जान हो, अभिमान हो !
पिता का सारा सुख तुम्ही से, तुम्ही से ही सुबह और शाम हो !!
माना कन्या देवी होती है, देवी हो के ही सब सहती है !
जो लोग देवी को पूजते हैं वही फिर दैत्य भी होते हैं !!
शैले, मैं नहीं मानता तुमको भगवती, मैं नहीं मानता तुमको आदिशक्ति
तुम तो मेरी बस तनुजा हो, पापा की आत्मा का हो आकार !
गंगा सी निर्मल, स्वछंद बहो, ना रुको कहीं, स्वतंत्र रहो !!

