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शैफाली

शैफाली दुबे एक सीनियर फार्मासिस्ट के तौर से कार्यरत हैं। वह फार्मेसी में परास्नातक हैं। 

बाकी

बादलों की सियाह कपकपाते हुए बसंत की चादर फैला गई,

लेकिन पतझड़ का हिसाब बाकी रह गया


सवेरे का सूरज इठलाया, इतराया

और सांझ तले ढल अंधेरा कर गया,

लेकिन धूप का हिसाब बाकी रह गया


ज़िंदगी बढ़ी, हंसी और कई रंगों में सजी,

लेकिन टूटे सपनों का हिसाब बाकी रह गया


जो मिल गया तो मन भर लिया,

जो मन का ना मिला तो भी मन कर लिया,

लेकिन छूटी आस का हिसाब बाकी रह गया


जलते चराग़ों से नए उजाले बसर करते रहे,

लेकिन अंधेरों का हिसाब बाकी रह गया


जो पाया उसका जश्न मनाते रहे,

ख़ुशी का राग सजाते रहे,

लेकिन खोए का हिसाब बाकी रह गया


कई बार जोड़ा कई बार घटाया,

फिर भी कुछ ऐसा उलझा है,

ज़िंदगी का हिसाब बाकी रह गया


इक शाम बैठा था जब साथ में,


ज़िंदगी उठ कर जाने लगी,

फिर रुकी और देखकर मुस्कुराने लगी,

यूं लगा ज़िंदगी तुझे जीना तो बाकी रह गया

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