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चाँद और रोटी

तुम्हारे हिस्से आई रोटी

मेरे हिस्से का चाँद क्षितीज पर है।

रोटी है ठंडी तुम्हारी,

चाँद कितना सुन्दर है,

देखो दोनों में कितना अन्तर है।

तुम्हारा हिस्सा छीन भी लें तो

मेरा हिस्सा कैसे लेगा?

मेरा हिस्सा दे दूँ तुझको?

क्या तू इसको रख लेगा?

रोटी भी अब सूख चुकी है,

रात भी आज पूनम की है।

ऋषिता सिंह

ऋषिता सिंह समकालीन हिंदी–उर्दू कविता की एक लेखिका हैं। उनकी रचनाओं में प्रेम, विरह, स्त्री-अनुभूति तथा सामाजिक यथार्थ की संवेदनशील अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। वे सरल किंतु प्रभावशाली भाषा के माध्यम से भावनाओं और अनुभवों को शब्द देने का प्रयास करती हैं। वर्तमान में वे विधि (LL.B.) की छात्रा हैं और साथ-साथ सक्रिय रूप से काव्य-लेखन में संलग्न हैं। उनकी कविताएँ मातृभाषा युगमंच सहित विभिन्न साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित एवं सराही गई हैं। लेखन उनके लिए कविता लिखना आत्म-अभिव्यक्ति के साथ-साथ समाज और मनुष्य की आंतरिक सच्चाइयों को समझने का माध्यम है।


इंस्टाग्राम - @hrishitasingh_

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