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केश तरल

जब कवि ढलता है

तो कविता रचता है,

कविता से निकला स्वर

पहुँचता है तरल बनकर

उसके केशों तक।


उसके केशों से तरल

गिरता है धरती पर,

धरती सोखती है उसे

अपना अंग मानकर।


मेरी कविता का स्वर

कठोर है, सत्य है

ये नहीं पहुँचता

उसके केशों तक।


ये गिरते-गिरते

उसके हाथों को

स्पर्श करता है,

उसकी दृष्टि बाँधता है,

दीर्घायु धरकर

उसके केश संवारता है।


वो स्वर अब

उसके नाम पर है,

और मेरा सर्वस्व

उसके केशों का दास।


वो स्वर अब मेरा नहीं

उसका है,

मैं कवि नहीं सो ढला नहीं।

मैं क्षणिक प्रेमातुर

आत्मा हूँ।


मैं उसके केशों का स्वर

अपनी घिसी-पिटी

कविता में चाहता हूँ।


मेरा कठोर स्वर

उसके केश संवारता है,

उसके केशों का स्वर नहीं बनता।

नंदिनी झा

नंदिनी झा का जन्म वृंदावन में हुआ, जबकि उनका मूल निवास बिहार है। वर्तमान में वे हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में सूचना प्रौद्योगिकी (IT) की द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं। १८ वर्षीया नंदिनी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मूल्यों से गहराई से जुड़ी हुई हैं। उनके जीवन में उनके माता-पिता प्रेरणा के प्रमुख स्रोत रहे हैं, जिनके संस्कार, मार्गदर्शन और विश्वास ने उन्हें निरंतर आगे बढ़ने, सीखने और अपने लक्ष्यों की ओर समर्पित भाव से कार्य करने की प्रेरणा दी है। अध्ययन के साथ-साथ उन्हें तकनीक, रचनात्मक अभिव्यक्ति और सामाजिक सरोकारों से जुड़े कार्यों में विशेष रुचि है, जिनके माध्यम से वे समाज के प्रति सकारात्मक योगदान देने की दिशा में प्रयत्नशील हैं।  


इंस्टाग्राम - @nandinii.jhaa

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