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घर

बीवी मेरी देती है ताना

यह घर है या पागलख़ाना


नहीं किसी से कोई मतलब

सारा घर है मेरे सिर पर


लेखन में उलझे तुम रहते

काग़ज़ काला करते रहते


कुछ कहूँ तो काटने को दौड़ो

और कहूँ तो मारने भी दौड़ो


बच्चे करते रोज़ लड़ाई

कभी नहीं वे करें पढ़ाई


नखरे उनके अजब निराले

मुन्ने को हार्लिक्स चाहिए


मुन्नी मांगे आरेन्ज जूस

सबके सब करते फ़रमाइश


चाहिए किसी को गर्म पकौड़ी

किसी को चाहिए गर्म जलेबी


कोई माँगता दूध गर्म

कोई कहता आइसक्रीम दो ठंडी


बाबूजी समाचार में उलझे

माँ जी देखें धारावाहिक हैं


कोई कहता है खीर पकाओ

कोई कहता है नहीं, कोफ़्ता


दादी उलझी पूजा-पाठ में

दादाजी की ऐनक गुम है


देवर पूछे – कहाँ है मोज़ा

कहाँ कहाँ नहीं मैंने खोजा


किसका किसका क्या क्या खोजूँ

मेरे दिमाग की बत्ती गुल है


बच्चों की यूनिफार्म है धुलनी

तुम्हारी कमीज़ भी प्रेस है करनी


दूधिये का हिसाब भी रखना

अख़बार का है पेमेंट करना


बच्चों की फ़ीस जमा है करनी

किताब में उनकी जिल्द है चढ़नी


किसकी किसकी बात करूँ मैं

किसका किसका काम करूँ मैं


मुझको भी अवकाश चाहिए

मुझको भी आराम चाहिए


कान खुले, पर नहीं हूँ सुनता

मुंह भी अपना बंद मैं रखता


बात है उसकी सही और सच्ची

बात है उसकी खरी और पक्की


जानता हूँ अपनी बीवी का हाल

हूँ जानता उसकी अगली चाल


चिल्लाकर जब वह थक जायेगी

ख़ुद-बख़ुद चुप वह हो जायेगी


उसके मर्ज़ का इलाज नहीं है

सभी औरतों का हाल यही है


घर की मुर्गी दाल बराबर

साग-पात और घास बराबर


जवाब नहीं सूझे है कोई

पागलख़ाना बूझे हर कोई|

शिव प्रताप पाल

शिव प्रताप पाल इलाहाबाद (प्रयागराज), उत्तर पद्रेश के निवासी है| संगणक विज्ञान विषय का अध्यापन करते हैं| हिंदी व अंग्रेजी में रचनाएँ करते हैं| मुख्यतः कहानियों और कविताओं के माध्यम से पाठकों के बीच लोकप्रिय हैं| इनकी रचनाओं में मानवीय संवेदनाएँ, प्रकृति-चित्रण, प्रेम, सामाजिक संबंध और जीवन के दार्शनिक भावों का सुंदर चित्रण मिलता है। इनकी रचनाएं विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं और ऑनलाइन साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित व पुरस्कृत हुई हैं| इन्होने २०१३ का कमलेश्वर स्मृति कथा सम्मान भी प्राप्त किया| वर्ष २०२० में इनकी एक अंग्रेज़ी कविता “The Songs of Peace: The World’s Biggest Anthology of Contemporary Poetry (2020)” में भी प्रकाशित हुई।

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