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गुलाब की चप्पल

चौखट के किनारे ही रखी थी,

गुलाब की चप्पल ;

हल्की गुलाबी, नरम, गद्देदार, सुगंधित

बिल्कुल सपनों जैसी

गुलाब की चप्पल,

फीते पंखुड़ियों जैसे कोमल !


पिछले शनिवार ही खरीदी थी

बाबा ने मेले से

गुलाब की ज़िद्द पर,

एक नेता बेच रहा था चौराहे पर

"अपनी ग़रीब टांगें दे दो

बदले में गुलाब की चप्पल ले लो

मुफ़्त, बिल्कुल मुफ़्त !"


अनपढ़ गुलाब बिस्तर पर बैठा

अपनी खरीदी गुलाब की चप्पल देख

मुस्कुरा रहा है,

नींद में ही सही, पर दौड़ लगा रहा है।

स्मृति अमृत

स्मृति अमृत कहती हैं कि वह बस अपनी भावनाओं को और परिस्थितियों को कविता के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना चाहती हैं। 

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