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अस्तित्व

ख़यालों का ये जगत मिथ्या

और ईश कहे, भगत मिथ्या

पाप पुण्य, रिवाज़ रस्म भी

रीति नीति भी फ़कत मिथ्या


ये कैद भी है अजब मिथ्या

आज़ादी ही हो जब मिथ्या

कहाँ चला पथिक, ये पथ मिथ्या

जो हूँ मैं हूँ, और सब मिथ्या


मैं सोच मेरी, मैं कर्म मेरा

मैं नाम मेरा, मैं धर्म मेरा

मुझसे है अस्तित्व मेरा

मैं खून मेरा, मैं मर्म मेरा


मैं मंज़िल भी, मैं राही हूँ

मैं क़लम भी हूँ, मैं स्याही हूँ

मैं याद मेरी, मैं बाद मेरे

जो हूँ मैं हूँ, बस मैं ही हूँ


सब कुछ मिथ्या, बस मैं ही हूँ

आर्यन सिंह चौहान "स्याह"

आर्यन सिंह चौहान का जन्म ३ जून २००३ को जगदलपुर, छत्तीसगढ़, में हुआ। वर्तमान में वह दिल्ली विश्वविद्यालय के शहीद सुखदेव कॉलेज ऑफ बिज़नेस स्टडीज़ में बीएमएस के छात्र हैं। उन्हें कविता, कहानियाँ और संगीत से गहरा लगाव है। खासकर पुराने गाने और ग़ज़लें उन्हें बहुत प्रभावित करती हैं, जिनसे उन्हें लिखने की प्रेरणा मिलती है। वह अपने विचारों और भावनाओं को सरल और सच्चे शब्दों में व्यक्त करना पसंद करते हैं। वह कविताएँ और कहानियाँ लिखते हैं, जिनमें रोज़मर्रा के एहसास, रिश्ते और भीतर के सवाल दिखाई देते हैं। उनके लिए लेखन केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि खुद को समझने और दुनिया को महसूस करने का एक माध्यम है।


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